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Contact Person : Roli Shukla
 
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उददेश्य
     आज के इस तनाव ग्रस्त जीवन में लोग इतना उलझते जा रहें हैं कि उनके पास खुद के लिए ही समय नहीं है । रोजमर्रा की भागदौड़ में अपने आप को ढूँढना मुश्किल सा हो गया है । सुबह घड़ी की पाँच बजे की टिक-टिक से लेकर रात के बारह बजे तक आम आदमी अपने काम में इतना व्यस्त है कि बाकी की दुनिया में क्या हो रहा है उसे कुछ नहीं पता । दुनिया तो दूर उसके घर के हालात क्या है यह भी वह ठीक से नहीं देख पाता । आज के युग में इस चूहा दौड़ ने इन्सान को वाकई एक मशीन बना दिया है जो सारा दिन सारी रात बस चलती ही रहती है ।

     प्रश्न ये है कि क्या सारा दिन दौड़ते रहने से हालात सुधर पायेगें । जो मंजिल इन्सान को पानी है वो वास्तव में उसे मिल पायेगी ? जो आराम की जिन्दगी के अपने परिवार को देना चाहता है, क्या वो उन्हे दे पायेगा ? इन प्रश्नों का उत्तर दे पाना बहुत कठिन है, कुछ भी कह पाना स्पष्ट नहीं है । हमने अपने आप को ऐसी जंजीरो में जकड़ रखा है, जिनका खुलना बहुत मुशिकल है । दफ्तर का तनाव, घर का तनाव, समाज का तनाव इन सबसे उबर पाना बड़ी ढेढ़ी खीर है । सबसे बडी समस्या ये है कि हम आँखों बन्द कर के बस चले जा रहे हैं बिना दिशा ज्ञान के । और हमें लग रहा है कि हम बहुत दूर, आगे बढ़ गये है मंजिल बस हमारे करीब है, ये शायद हमारा मति-भ्रम है । इससे हम कुछ भी हासिल नहीं कर पायेगें, हाँ इस बात से हमें झूठी तसल्ली जरूर हागी कि हम कितना काम कर रहे है ।

     समाज में बहुत सारे लोग ऐसे है जिनकी शिकायत रहती है कि हमें इतना काम करने के बाद भी उसका समुचित फल नहीं मिलता । मगर शायद वो भूल जाते है कि काम अधिक करने से कुछ नहीं होता । जरुरी ये है कि जिस दिशा में हम काम कर रहे है वो हमें पता होनी चाहिए । इससे काम का दबाव भी कम होगा और समय भी कम लगेगा । जीवन में हमारा उदेद्श्य क्या है ये जान लेना आवश्यक है । कभी-कभी हम काम सिर्फ काम करने के लिए करते है । पर वास्तव में हम क्या करना चाहते है, ये हम भली-भाँति पहचान नहीं पाते । फिर या तो कभी परिवार के दबाव में आके, कभी समाजिक प्रतिष्ठा के चक्कर में हम अपने आप से समझौता कर लेते है और बस पैसा कमाने के लिए उसी चूहा दौड़ में एक निरीह प्राणी बन कर रह जाते है ।

और सच बात तो यह है कि ये दौड़ सारा जीवन खत्म नहीं होती । और दौड़ते भागते हम अपना जीवन व्यर्थ गंवा देते है । अन्त मे जब हमारे पास और काम करने की शक्ति नहीं रह जाती तब हम सोचते है कि शायद जो काम हम स्वंय करना चाहते थे, जिसमें हमें रूचि थी हमें वही करना चाहिए था तब शायद हमें हमारी असली मंजिल मिल जाती और हम सही रूप में सफल होते ।

     इन बातों का पछतावा तो होता है, लेकिन कभी भी किसी काम के लिए देर नहीं होती । जब जागो तभी सवेरा, अगर आप को लगता है कि इतना समय नष्ट करने के बाद आप को अपनी असली मंजिल दिख रही है तो फौरन अब बिना समय व्यर्थ किये उसी दिशा पर बढ़ते जाइये और यकीन मानिये आप जरूर उसे हासिल करेगें । तब आप काम आनन्द के साथ करेगें और मन लगा कर करेगें और आपका काम आपके लिए कर पूजा के समान होगा ।

     आज न सिर्फ हमे बल्कि आगे आने वाली नस्लो को सामने विकल्प खुले रखने चाहिए कि काम जो रूचिकर लगे, आपकी योग्यता के अनुसार हो वही करना चाहिए । दूसरों से कम अपने आप से प्रभावित होना सीखें, अपने ऊपर विश्वास रखें, अपनी योग्यता का सद्उपयोग करें, तो निश्चित रूप से सफलता प्राप्त होगी ।
 
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