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तुच्छ प्रयास
परहित जो उपकार करे अपना कोई स्वार्थ न देखे
ऐसे मानव हमने कहानी में मात्र सुने थे
किन्तु अहो सौभाग्यवश मैंने प्रत्यक्ष ये देखा
कृपा प्रभु की कहूँ इसे या भाग्य हस्त रेखा का
सरल धार्मिक नम्र हृदय, मैंने गुण उनमें पाये
माँ कात्यानी के समक्ष है आसन अपना लगाये
मुख-मण्डल पर दिव्य ओज है, नेत्रों में है परम ज्योति
ऐसी आलौकिक शक्ति, मानव में प्रथम बार देखी
देख दृष्य ये अदभुत हो उठी मैं भाव-विभोर
ऐसे मानव भूमि पर क्या होंगे अब और
पर दुख को अपना जानकर, निवारण करने को तत्पर
अभयदान दे कर गुरु जी, करते हैं कृपा सब पर
धन का लोभ नहीं है उनको और न लगन ख्याति की
दिन के जैसा तेज है उनमें, शीतलता रात्रि की
कात्यानी माँ के फल से गुरु जी के दर्शन प्राप्त हुए
उनके सत्कर्मों का परिचय, पा कर हम कृतार्थ हुए ।
 
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