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संघर्ष
जन्म लेने के लिए शिशु को संघर्ष करना पड़ता है
कि पता नही, वो जीवित बचे न बचे
यदि सफल हुआ तो आगे के संघर्ष की ओर कदम बढ़ाता है
और यदि विफल हुआ तो संघर्ष वहीं समाप्त हो जाता है
बाल्यावस्था में आने के लिए वह स्वंय को तैयार करता है
बोलना सीखता है, चलना सीखने के लिए कई बार गिरता है, चोट सहता है
और इस प्रकार से बाल्यवस्था में भी वो संघर्षरत रहता है
बाल्यावस्था को पार कर, जब वो युवावस्था मे आता है, तो उसका संघर्ष और भी बढ़ जाता है
विवाह कर, जीवन निर्वाह का संघर्ष
शिशु प्राप्ति पर उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति का संघर्ष
और यदि नौकरी पास में नहीं है तो दुगना संघर्ष
सच मनुष्य को मन जीवित रहने के लिए इतना संघर्ष करना पड़ता है
जबकि मनुष्य तो सर्वश्रेष्ठ होता है
दुःख में तो संघर्ष होती ही है
किन्तु यहाँ सुख प्राप्त करने के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है
वृद्धावस्था में आते-आते वो आदी हो जाता है
नित्य उसके जीवन में संघर्ष ही संघर्ष आता है
किन्तु अब उसके पास सहनशक्ति नही रह जाती, तो वो ईश्वर से मुक्ति माँगता है
तो मृत्यु के लिए भी उसे संघर्ष करना पड़ता है
कभी श्वास रूकती है तो कभी चलती है
कभी आत्मा छटपटाती है तो कभी तड़पती है
और इतने लम्बे संघर्ष के बाद उसे मृत्यु प्राप्त होती है
और इस प्रकार एक संघर्ष समाप्त हो जात है, दूसरा संघर्ष आरम्भ करने के लिए
और फिर से मनुष्य तैयार हो जाता है, उस दूसरे संघर्ष का सामना करने के लिए ।
 
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