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Contact Person : Roli Shukla
 
Email Id: info@rolishukla.co.in
 
 
परिचय
     नवाबों के शहर लखनऊ में, उन्नीस सौ बहत्तर की पैदाइश ने मुझे इस दुनिया का हिस्सा होने का अहसास कराया । बचपन से बड़ा होने तक का सफर अच्छी शिक्षा और अच्छे संस्कारों वाला रहा । कान्वेन्ट से ले कर लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रांगण तक पढ़ाई के साथ-साथ जीवन के मूल्यों को समझने का प्रयास जारी रहा । आरम्भ से ही रूचि कविता लिखने और मन्च सन्चालन की रही । सजृनात्मक लेखन और अन्य कलात्मक चीज़ों की ओर रूझान रहा । मनोविज्ञान जैसे विषय में परस्नातक होने के बाद यू.जी.सी.नेट. परीक्षा पास कर के लखनऊ विश्वविधालय में प्रवक्ता पद पर रह के छात्रो को मनोविज्ञान को मात्र विषय के रुप में न पढ़ा कर, इसे जीवन को सही ढ़ंग से जीने के तरीके के रुप में समझाया । स्वयं भी प्रयास किया, इस कला को जीवन में उभारने का । लोगों के साथ-साथ स्वयं को भी समझने का ।

     विवाह हो जाने के बाद रुख किया दिल्ली का, एक ऐसा शहर जहाँ पर लगा सपनो की सिलसिला जो शायद बचपन में शुरु हुआ था, धीरे-धीरे मूर्त रुप लेने लगा । मौका मिला एक बार फिर मनोविज्ञान की कला सिखने का । ये सुअवसर दिया मुझे अमेटी विश्वविघालय ने । पढ़ाने के अलावा अन्दर की कला बाहर निकलने को आतुर हो गयी । कई मौके भी मिले अपनी कला को सिद्ध करने के । ट्रेनिंग के क्षेत्र में भी लोगों ने सराहा । कारपोरेट के लोग, शिक्षक, वर्ग, सुरक्षाकर्मी, सेनाअधिकारियों से ले कर दिल्ली पुलिसकर्मियो तक को ट्रेनिंग देने का सुअवसर मुझे प्राप्त हुआ । और ऐसा करते आत्म सन्तुष्टि का वो अनूठा अनुभव जो उस वक्त हुआ था, आज भी हमेशा मेरे साथ रहता है । अंग्रेजी के अलावा अपनी मात्र भाषा हिन्दी ने बहुत सम्मान दिलाया । हिन्दी कवितायें जो पहले कभी कागजो और किताबो की अलमारी में कैद थी, अपनी सभी जंजीरे तोड़ कर कला के खुले आसमान में खुल कर सांस लेने लगी । थोड़ा, देर मे ही सही लेकिन रास्ते अब कुछ साफ दिखने लगे । कलम में मानों एक नयी जान सी आ गयी, हौसले थोड़े और बुलन्द हुए और अहसास हुआ कि जो कला पास है क्यों न उसे सभी के साथ बाटाँ जाये ।

     इस तकनीकी युग में नये उपकरणो का लाभ उठा कर, नये-नये साधनों का प्रयोग कर के लोगो के मन को टटोला जाये । कुछ अपनी कह कर कुछ दूसरो की सुन कर सुख-दुःख का भावनात्मक आदान-प्रदान किया जाये । ध्यान आया कि घर बैठे लोगो तक पहुँचने का सबसे अच्छा माध्यम अपनी वेबसाइट बनाना है । लोग मेरी कविताये व लेखो को पढे़ उन्हे सराहे और उनमे संशोधन के नरीके भी बताये, जिससे मेरा रचनात्मक विकास होता रहे और मैं अपनी बात, अपने विचार लोगो तक बखूबी पहुँचा सकूँ । पढ़ाने, कविताये और लेख-लिखने, ट्रेनिंग देने के अलावा वाइस ओवर के क्षेत्र में भी अच्छे अनुभव रहे । आवाज, एक अति सशक्त माघ्यम होती है लोगो के करीब जाने की । आवाज में अगर दम है तो आप अपनी बात बहुत सहजता के साथ प्रभावशाली ढ़ंग से कह सकते है । माँ सरस्वती के इस वरदान नें भी मेरे व्यक्त्तिव को और सँवारने में सहायता की । वाइस ओवर के कुछ असाइनमेन्ट किये जो टी.वी.चैनलों प्रसारित हुए । लोगो ने इस काम की भी प्रंशसा की । आत्मविश्वास, धीरे-धीरे बढ़ता गया । और आज इस बात का अहसास हो गया है कि आप के अन्दर छिपी कला किसी की मोहताज नही होती । जब वो बाहर निकल कर आती है तो वो काम कर जाती है जिसकी आपने कल्पना भी नही की होती । आप एक ऐसे स्वछन्द वातावरण में जीने लगते है जहाँ भावों का सागर अनवरत बहने लगता है विचारो की लहरे अठखेलियाँ करती हुयी उस गन्तव्य की ओर बढ़ती है, जहाँ फिर एक नई लहर उठती हुई दिखती है, जो आप को फिर एक नये रास्ते की ओर ले जाती है । अब देखिये मेरा ये सफर मुझे कहाँ तक ले जाता है, पर मन में एक विश्वास, एक उम्मीद जरुर है कि मेरी मन्जिल मुझे जरुर मिलेगी । और अगर आप सभी का साथ रहा तो ये सफर और भी ज्यादा खुशनुमा हो जायेगा ।
 
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