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नारी शक्ति
कल रात्रि स्वप्न में मैंने एक रूपसि को देखा ।
श्वत वस्त्रों से सुसज्जित एक सुन्दी को देखा
यही नहीं नाना अलंकारों से अलंकृत थी वो
लगता था अनेक मधुर छन्दों में छन्दबद्ध थी वो
गीता थी संगीत थी वो
और किसी की नहीं वरन कवि की प्रीति थी वो
लगता था भावों से भीगी हुयी है
बालों से जन नहीं विचार बिन्दु टपकते थे
जो उसके रूप को और अधिक उज्जवल कर देते थे ।
श्रंगार रस से परिपूर्ण प्रतिमा थी वो
किसी देश का गौरव या गरिमा थी वो
कन्ठ उसका अथ्यधिक मधुर था
मुख से पुष्प नहीं रस निकलने को आतुर था
नेत्र उसके किसी प्रमिभा के प्रकाश से चमकते थे ।
हस्त उसके कला कौशल के आलोक से दमकते थे
अधरों को आनन्द में रूचि थी
और स्वयं उसकी अवर्णनीय छवि थी
उसकी चाल लय वह थी
वो तुक यति गति को ध्यान में रख के चलती थी
उसको यही कला सभी का मन मोह लेती थी
लोग उसकी प्रशंसा करते थकते न थे
और उसे हर युग में देखना और सुनना चाहते वो
सभी की यही अभिलाषा थी कि वो उसे सदा इसी रूप में देखें ।
और कोई भी उस स्वछन्द अभिव्यक्ति को कभी न रोके
सबसे अधिक तो वो कवि को प्यारी थी
उसके और कवि के सम्बन्ध की विशेषता ही निराली थी
कवि उसका और वह कवि की सहगामी थी
कभी कवि बन जाता उसका और वह बन जाती कवि की अनुगामी थी
वह कोई स्वप्न नहीं एक वास्तविकता है
वह रूपसि कोई और नहीं
स्वयं कवि की कविता है ।
 
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