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कवि की पत्नियाँ
एक बार एक कवि महाशय लिख रहे थे कविता
लिख रहे थे कविता आ गयी उनकी पत्नी सविता
उनकी पत्नी सविता, कवि को चैन न आवे
चैन न आवे कवि को उन्हें फिर कछु न भावे
कछु न भावे कवि को कविता पूरी न होय
कविता पूरी न होय कवि की कवि फिर सिसक के रोय
सिसक के रोय कवि उनको सविता मनावे
सविता मनावे कवि को कवि को कछु न भावे
कछु न भावे कवि को उन्हें पसीना छूटे
पसीना छूटे कवि को उनकी पत्नी रूठे
पत्नी रूठे कवि की कवि फिर उन्हें मनाये
उन्हें मनाये कवि अपनी कविता सुनाये
कविता सुनाये कवि पत्नी कान करे बन्द
कान करे बन्द पत्नी बैठी खाये कलाकन्द
खाये कलाकन्द पत्नी छोड़ के भागी कमरा
छोड़ के भागी कमरा पत्नी बोली, कहाँ फसें हम
कहाँ फसे हम पत्नी बोली कविता में जरा नहीं दम
जरा नहीं दम कविता में अब हो गयी रात
अब हो गयी रात कवि की कविता हुयी समाप्त ।
 
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