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कटु सत्य

अन्धकारमय रात थी
मात्र उल्लुओं की भयानक आवाजे सुनाई दे रहीं थीं
मैं काम से कही जा रहा था
वो भी उधर से ही आ रहा था
विचित्र सा रूप था
वह एकदम मूक था
देखकर मैं डरा
फिर सोचा डरने की क्या बात है
किन्तु अन्धेरी रात है
भगवान का नाम ले मै चलता रहा
वह मेरे पीछे-पीछे आता रहा
अचानक सुनसान सड़क पर
उसने मुझे रोक लिया
मेरा धन लुटने वाला है
मैंने पहले ही सोच लिया
उसने मुझे छुरा दिखाया
फिर मेरा माल हथियाया
न जाने मुझमें इतना साहस कहाँ से आया
और मैं बोल उठा
लोगों को लूटते तुम्हें शर्म नहीं आती
यह सुन के वो रूक गया और कहने लगा
मेहनत की कमाई लाता हूँ
तुम्हारा दिया नहीं खाता हूँ
लूटते तो वो भी है, जबकि इतने अमीर है
मैं गरीब हूँ इसलिए मेरा लूटा हुआ दिखता है, मुझमें और उनमें एक ही फर्क होता है
कि वे छिप के लूटते है
और मैं सामने लूटता है
अब कहिए क्या मैं झूठ कहता हूँ
ऐसा करिए मेरी नौकरी लगवा दीजिए
इससे पहले कि मैं कुछ कहता
वह बोल उठा
सोर्स तो होगा नहीं
बात है न एकदम सही
मैंने उससे मुछा, अच्छा तुम हो कौन ?
वह बोला प्यार का नाम तो आपने ले ही लिया है
मुझे लुटेरे की उपाधि से सम्मानित किया है
खैर, मैं ग्रेजुएट हूँ कई डिग्रियाँ है
घर में बीवी है और दो लड़कियाँ है
मैंने पूछा तुम कोई अच्छा काम ही कर लेते
अच्छा क्या आप मुझे डिग्रियाँ होते
हुए भी बिना सोर्स के रख लेते
मैं चुप हो गया
वह सचमुच जीवन के कटु यथार्थ को कह गया
मैं करता भी क्या उसे कैसे सुधार सकता था
उसे समझाने का विषय एकदम मूर्खता था
लूटमार छोड़ता भी तो कैसे ?
यदि उस प्रकार नहीं तो इसी प्रकार सही
उसे तो मात्र कमाने थे पैसे
परिस्थिति ने उसे कैसा बना दिया था
कितना योग्य था और कितना अयोग्य बन गया था
वो मेरा धन ले के चलता चला गया
और मैं उस कटु सत्य की ओर
एकटक देखता रह गया ।

 
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