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Contact Person : Roli Shukla
 
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कल रात्रि स्वप्न में मैंने एक रूपसि को देखा ।
श्वत वस्त्रों से सुसज्जित एक सुन्दी को देखा
यही नहीं नाना अलंकारों से अलंकृत थी वो
लगता था अनेक मधुर छन्दों में छन्दबद्ध थी वो
गीता थी संगीत थी वो
और किसी की नहीं वरन कवि की प्रीति थी वो
लगता था भावों से भीगी हुयी है
बालों से जन नहीं विचार बिन्दु टपकते थे......
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आज के इस तनाव ग्रस्त जीवन में लोग उलझते जा रहे हैं कि उनके पास खुद के लिए ही समय नहीं है । रोजमरी की भागदौड़ में अपने आप को ढूँढना मुश्किल सा हो गया है । सुबह हाड़ी की पाँच बजे की टिक-2 से लेकर रात के बारह बजे तक आम आदमी अपने काम में इतना व्यस्त है कि बाकी की दुनिया में क्या हो रहा है उसे कुछ नहीं पता । दुनिया तो दूर उसके घर के हालात बचा है .......
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