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गर्व
निष्क्रियता से घिरा हुआ मैं
कागज कलम के पास बैठा हुआ था
कि अचानक वायु का एक झोंका आया
जिसने मेरे अन्तरमन को हल्का सा हिलाया
विचारों में भी कुछ उतार चढाव आया
और मैंने कलम पकड़ ली
मन रचनात्मक सृजन की ओर भाग रहा है
मस्तिष्क कलम के अस्तित्व को आँक रहा है
कि आखिर इस जरा सी नली में है क्या ?
स्याही डालो तो चलती है
स्याही के बिना सदैव रूकती है
ये तो सदा कवि की मुठ्ठी मे रहती है
तो महान तो मनुष्य हुआ
अपने इस तर्क पे मुझे बड़ा गर्व हुआ
मैंने सोचा कलम को तो जैसा आदेश दो वैसा करेगी
कार्य के समय कार्य और वैसे तो निष्क्रिय रहेगी
ये तो कवि ही है जो उसे आलस्य से उठाता है
और कार्यशील बनाता है
तो महान तो मनुष्य हुआ
मुझे अपने इस तर्क पे भी बड़ा गर्व हुआ
किन्तु कुछ क्षणों बाद वायु का एक झोंका फिर आया
जिसने मेरे मस्तिष्क के तर्क को दूर जा गिराया
अन्तरआत्मा ने मुझ पर पूर्ण अधिकार प्राप्त कर लिया
और फिर मुझसे प्रश्न किया
तुम्हें कवि किसने बनाया ?
मेरा मैं हतप्रभ रह गया
मेरा मुख निरूत्त हो गया
और मन ने उत्तर दिया
कलम ने तुम्हें कवि बनाया
हाँ उसी नली ने तुम्हें सम्मान दिलाया
और रही बात स्याही डालने की
तो जीवित रहने के लिये भोजन तो चाहिए होता है
क्या तुम्हारा मैं बिना भोजन जीवित रहता है
हाँ कलम मनुष्यों की भाँति रक्त नहीं बहाती
अपितु रक्त बहने से रोकती है
मनुष्यों के पारस्परिक टकराव से रक्त की धार निकलती है
किन्तु कलम कागज से टकरा के शब्दों के मोती बिखेरती है
मनुष्य शस्त्रों के प्रेमी होते है
और वो शास्त्रों की
जिनका अध्ययन तुम्हारे संस्कार में आता है
फिर भला कलम को नीचा दिखाना क्या तुम्हें भाता है
कलम ने काव्य का निर्माण किया
जिसने इस नीरस संसार को प्राण दिया
अरे कलम तो वो शस्त्र है, जो शस्त्र न
होते हुए भी मनुष्य को योद्धा बनाती है
किसी युद्ध हेतु नहीं शान्ति के लिए
नरसंहार हेतु नहीं क्रान्ति के लिए
मन ने कहा तो महान तो लेखनी हुयी
मेरी बात है न बिल्कुल सही
वास्तव में मेरा मै दब के रह गया
और मेरा अन्तरमन सब कुछ कह गया
ये बात मुझे तब समझ में आयी
जब मैं ये जान पायी
कि ये सारा वार्तालाप मैं आप तक अपनी
कलम द्वारा ही पहुँचा पा रही हूँ
और तभी एक कवियत्री होने की
उपाधि पा रही हूँ
 
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