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दृष्टिकोण
     माता-पिता ईश्वर से भी बढ़ कर होते हैं । भारतीय संस्कृति ने हमें यही सिखाया है । अपनी माता के कहने पर श्री राम चौदह वर्षों के लिए वनवास चले गये, अपनी माँ के आदेश पर भगवान गणेश ने शिव जी को घर के अन्दर प्रवेश न करने के लिए युद्ध किया, कुन्ती माँ की आज्ञा पर अर्जुन के द्रौपदी को आपस मे बाँट लिया । ये था अपने पूर्व युग में अपने अपने माता-पिता का सम्मान । माता-पिता का हृदय अपने बच्चों के लिए जैसा पहले था वैसा ही अब भी है । वो हमारे जन्मदाता है हमारा पालन पोषण स्नेह के साथ करते है, हमें सतकर्मों की ओर प्रेरित करते है और हमेशा यही चाहते है कि हम जीवन में आगे बढ़े और वही संस्कार जो उन्होनें हमें दिये है, हम उन्हें अपनी सन्तानों को भी दे । हमारी खुशी में ही उनकी खुशी होती है, वो निस्वार्थ कर्म करते है, हमारी उन्नति में ही उनका सुख होता है ।

     किन्तु आज के आधुनिक परिवेश में शायद माता-पिता को हम वो दर्जा नहीं दे पा रहे है । माँ बाप हमें बड़ा करने में जो मेहनत करते है, जो कष्ट उठाते है, आज सन्ताने उसे मात्र उनका फर्ज बता रही है । जो सपने वो हमारे लिए देखते है, उसे बच्चे उनका स्वार्थ कह कर अपमानित कर रहे है । आदर सम्मान के स्थान पर सन्ताने उन्हें पुराने ख्यालात का कह कर नीचा दिखा रही है । यदि वो अपने बच्चों को कोई बात समझाना चाहते है, तो बच्चे अपना पक्ष आगे रख कर उसे काट देते है । विरोध करना आज कल की युवा पीढ़ी की कुछ आदत सी हो गयी है । अपनी जिद के आगे आज कल की युवा पीढ़ी माता-पिता की एक नहीं चलने देती । युवा अवस्था में पैर रखते ही वो अपने आप को स्वतन्त्र समझने लगते है । स्वतन्त्र होना एक हद तक ही अच्छा होता, बिना अकुंश की स्वतन्त्रता के परिणाम अच्छे नहीं होते, इसका अहसास उन्हें बाद में होता है जब हालात काबू से बाहर हो जाते है ।

     इसके कई कारण हो सकते है, या तो ये पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव है या फिर माता-पिता के पालन पोषण के तरीके में कुछ खामियाँ हो सकती है । आज के आधुनिक काल में, माता-पिता भी बच्चों के बड़े कम, दोस्त बन कर रहना ज्यादा पसन्द करते है । हालाकि इसमें कोई बुराई नहीं है किन्तु दोस्ती की भी अपनी हदें होती है । माँ-बाप और बच्चों के बीच मे दोस्ताना व्यवहार होना चाहिए, लेकिन एक बात आरम्भ में ही साफ कर देनी चाहिए कि वो उनके माता-पिता है, सिर्फ दोस्त नहीं । ये फर्क बच्चों को पहले से बता देना जरूरी होता है । माता-पिता में एक दोस्त ढूढ़ना अच्छा होता है किन्तु आप एक दोस्त में माता-पिता नहीं ढूढ़ सकते । आधुनिक होना पाश्चातय होने से कही अच्छा होता है । हमारे आचार विचार आधुनिक होने चाहिए । हमारा नज़रिया आधुनिक होना चाहिए, हमारी सोच आधुनिक होनी चाहिए किन्तु साथ ही साथ हमें अपनी सभ्यता और संस्कृति को भी नहीं भूलना चाहिए । विदेशी तौर-तरीके कई मामले में सही होते है और कई मामले में नहीं । यही चाजें हमारे देश पर भी लागू होती है । हर संस्कृति से हमे अच्छी चीजें ग्रहण करनी चाहिए जो हमारे लिए लाभप्रद हों । आँखें बन्द कर के किसी चीज का अनुसरण करना कहाँ की समझदारी होती है ।

     ताली दोनों हाथों से बजती है इसलिए प्रयास दोनों ओर से होना चाहिए । किन्तु सन्तान के नाते हमारे भी कुछ फर्ज होते है अपने माता-पिता के प्रति । और फर्ज से भी अधिक जरूरी है हम सन्तानों को उनकी भावनाओं को समझना और उन्हें स्नेह और सम्मान देना । जीवन में कोई भी माता-पिता का स्थान नहीं ले सकता, शायद ईश्वर भी नहीं है । हम उनकी उम्मीदों पर शत-प्रतिशत खरे शायद न उतर सके लेकिन कम से कम उन्हें इस बात से आश्वस्त जरूर करा सके कि वो हमसे उम्मीदें कर सकते है ।

     आज की पीढ़ी को जरूरत है कि वो अपने माता-पिता के भी दृष्टिकोण को भी समझे और अपना नजरिया भी उन्हें सहजता के साथ समझा सके । उनसे दोस्ती रखे लेकिन उन्हें सिर्फ दोस्त न समझे । उनसे दूरी न बढ़ाये बल्कि बातचीत के जरिये उनके और करीब आने की कोशिश करे, उनसे परानुभूति रखे, अपने आप को उनकी जगह रख कर सोचे । आखिर एक न एक दिन सन्तानों को भी आगे चल कर माता-पिता तो बनना ही है ।
 
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