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बाल श्रम
     कहते है कि बच्चे भगवान का रूप होते हैं उन्हें देखते ही हम अपनी दुख तकलीफ कुछ समय क लिए भूल जाते है । उनके कोमल हाथो का स्पर्श हमे सुख प्रदान करता है । उन्हे गोद मे लेते ममता स्वतः ही उमड़ आती है किन्तु आज के परिवेश में ये सारा स्नेह प्रेम, सिर्फ अपने बच्चो तक ही सीमित रह गया हैं हम कभी नही चाहते कि हमारे कोमल बच्चे अपने नन्हें नन्हे हाथो से काम करे यदि वो कभी करने कि कोशिश करते हे तो हम उन्हें ये कह के रोक देते हैं कि वो अभी छोटे है। हमारा ध्यान उनकी शिक्षा की और होता हैं । उनके अच्छे पालन पोषण की और होता हैं ।

     हम अपने बच्चों के प्रति इतना समर्पित हो जाते हैं कि दूसरो के बच्चो को शायद बच्चा नही समझ पाते । हम इनते स्वार्थी हो जाते हे कि हम शायद अन्य बच्चो से भेद भाव रखने लगते हैं । आज प्रतिस्पर्धा के युग मे पति पत्नी दोनो ही कामकाजी होते है । घर चलाने के लिए शायद ये सब जरूरी भी हैं अपने बच्चो की देखभाल के लिए वो कम उम्र के बच्चे, नौकर के तौर पर रख लेते है । चाय के दुकानो पर, होटलो मे, बडे़-बडे़ कारखानो में कार्यालयो मे आज ऐसे ही गरीब और जरूरत मन्द बच्चो की भरमार हैं । जो मजूदरी करके अपने परिवार के लिए दो वक्त की रोटी कमाने मे लगे रहते हैं ।

     ज्यादातर ये बच्चे, गरीबी की रेखा से नीचे वाले तबके से होते है या फिर ग्रामीण इलाके के या शहरों में झुग्गी-झोपड़ियों मे रहने वाले होते है । मजदूरी कर के ये बच्चे अपने माता-पिता का हाथ बटाते है, जिससे कम से कम कुछ और पैसे इक्ठ्ठा हो जाये, और उनका परिवार अपनी प्राथमिक आवश्यकताओं को कुछ हद तक पूरा कर सके ।

     बाल श्रम के कारण कई हो सकते है जिनमें जनसंख्या का तेजी से बढ़ना, बेरोजगारी शिक्षा का आभाव, भूखमरी आदि मुख्य है । इन तबकों से एक-एक घर में पाँच-छः बच्चे होना, अपने आप में एक बहुत बड़ी समस्या जो जाती है । यहाँ कमाने वाला एक और खाने वाले सात-आठ हो जाते है । तो मजबूर लोग अपने बच्चों को काम पर लगा देते है । शिक्षा के आभाव में इन बच्चों के माँ-बाप परिवार नियोजन के बारे में भी नहीं जानते ।

     एक ओर से यदि अनभिज्ञता और अज्ञानता इनकी ओर से होती है तो दूसरी ओर हम शिक्षित वर्ग भी ये अज्ञानता और अनभिज्ञता प्रदर्शित करते है, और इसी बाल-श्रम को बढ़ावा देते है । कहीं न कहीं हम भी पढ़-लिख कर गलतियाँ कर बैठते हैं । अपने घरों में दुकानों में, आफिसों में, फैक्ट्ररियों में बच्चों को नौकर की तौर पर रख लेते है । हलाँकि इस बात की भी दलील दी जा सकती है कि बच्चों से काम के बदले पैसे दिये जाते है जिनकी उनको और उनके परिवारों को जरूरत होती हैं । बाल-श्रम पर कानून बने होने से भी कोई उसका अनुसरण नहीं करता । हम अपने फायदे के लिए, उन बच्चों से उनका बचपना छीन रहे हैं । सरकार द्वारा चलाये गये साक्षरता के अभियान से भी कुछ खास लाभ होता नहीं दिखता । या कमी सरकारी नीतियों में है, या फिर उसका निर्वहन करने में या बहुत हद तक हम पढ़े लिखे सम्भ्रान्त लोग समाज के प्रति अपने कत्तव्यों को भूलते जा रहे है । सरकारी नीतियों और कानून का उदेदे्श्य तो अच्छा होता है किन्तु कमी उनका ठीक प्रकार से पालन करने में हो जाती है ।

      हम लोगों को आज जरूरत है कि हम कानून का पालन करे, नीतियों का निवहन करे और सबसे बड़ी बात है कि हम स्वयं जागरूक हो जायें, इन सेवी संगठनों का सहयोग करे, कम से कम एक बच्चे को साक्षर करे । हमारे घर में जो काम करने वाले है कम से कम उनका मार्ग दर्शन करे उन्हें समझाये कि वो अपने बच्चों की शिक्षा की ओर ध्यान दें । याद रखे शुरूआत हमेशा अपने घर से ही होती है । तो आईये हम सब मिल कर ये प्रण ले कि हम सभी बच्चों के साथ बच्चों की तरह का ही व्यवहार करेगें । उनमें भी बाल कृष्ण की छवि देखेगें ओर कम से कम उनके चेहरे पर एक छोटी सी मुस्कुराहट लाने का प्रयास करेगे । क्योंकि आज के बच्चे ही कल का भविष्य है ।
 
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