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Contact Person : Roli Shukla
 
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वह होली
हुई प्रभात गया रंग घोला
भर गयी सब पिचकारी
किन्तु एक कोने में बैठी थी एक वृद्धा बेचारी
आगे पीछे कोई नहीं था वह थी स्वयं अकेली
उसका जीवन कुछ ऐसा था जैसे कोई पहेली
वातावरण था रंगारंग और रंग था सब दिशा में व्याप्त
किन्तु वो वृद्धा अश्रुधारा से कर रही थी करूण विलाप
गृह-गावाक्ष से वह सबकी देख रही थी होली
अश्रु प्रवाहित हो रहे थे किन्तु वह कुछ न बोली
देख के एक बालक को खो गयी अतीत में
गा तो सकती थी वो, पर स्वर नहीं थे गीत में
स्मृति आ गयी थी उसको अपने प्यार लाल की
याद आ गयी थी उसको होली पिछले साल की
अस्वस्थ हो गया था वो कई दिन और मास से
विरक्त हो गया हो जैसे कोई भी मुख हास से
किये गये कई प्रयास किन्तु सब हुए असफल
किंचित मात्र उसकी अवस्था न पायी थी सम्भल
कुछ दिन उपरान्त आया होली का त्यौहार
चाह कर भी खेलने न जा पाया कुमार
अंतिम बार माँ से बोला माँ ला दे गुलाल
नेत्र पट बन्द हुए माँ रो के हुयी बेहाल
इसलिए वह दुखी अधिक थी काश आज होता वो लाल
भर पिचकारी उसको देती और देती रंग गुलाल
 
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