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अनुज
वह लघु नव कोमल सा लगता
हँस देता तो प्रसून खिलता
उसका मन है जल सा चंचल
चलता, न कभी रहता अविचल
क्रीडाये करता है पल-पल
वह अभी दीप की ज्योति है
वह सबके हृदय की मोती है
मात-पिता की आशायें सब उस पर निर्भर होती है
उसके अन्तर में नहीं द्वेष
बस यहीं है उसका सरल भेष
क्रीडाये कर वह हसँता है
वाणी में उसकी सरसता है
चक्षु है उसके कुंजकली
सब लोग खिलाते गली-गली
उसके कोमल-कोमल से हस्त
रहते क्रीडा में सदा व्यस्त
उसके अधर है लाल वर्ण
दो सुन्दर से लगते है कर्ण
उसका शरीर है श्याम वर्ण
वह बाल कृष्ण होता प्रतीत
लगता है वह कोई मधुर गीत
ईश्वर करे वो सदा रहे सुखी
जैसे विकसित हुआ चन्द्रमुखी
वह सबको बडा़ ही प्यारा है
वह प्यारा अनुज हमारा है
 
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